Friday, February 26, 2021
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जीवानाम सेवार्थे समर्पित:

प्रवीण कुमार शर्मा
सत्तत विकास चिंतक


परस्पर प्रेम, सह आस्तित्व और समान अधिकार पर आधारित भारतीय संस्कृति ने समस्त भूमंडल के प्राणी जगत को हमेशा से अपने परिवार का हिस्सा माना है। जस्टिस राजीव शर्मा ने अपने एक अति महत्वूर्ण फैसले में समान अधिकारों की इस अवधारणा की पुष्टि करते हुए कहा कि “पशुओं के भी मनुष्यों के समान ही अधिकार है” परन्तु वास्तविकता के धरातल पर जब तथ्यों का अवलोकन करते हैं तो यह अवधारणा सच्चाई से कोसों दूर नज़र आती है। हिमाचल प्रदेश के ही संदर्भ में अगर बात करें तो 78 लाख मानव जनसंख्या के लिए निर्धारित 49,121 करोड़ रुपए के बजट में प्रदेश के 45 लाख पशुधन के लिए एक प्रतिशत से भी कम , मात्र 477 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान है। मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए जहां 3,010 करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया गया है वहीं पशु चिकित्सा सेवाओं के लिए केवल 269 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है जबकि प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में पशुधन का योगदान 4.95% है। हिमाचल जिन क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ सकता है उनमें एक पशुपालन भी है और इस क्षेत्र की उपेक्षा प्रदेश सरकार करती है तो यह अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही होगा।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दुगना करने का लक्ष्य निर्धारित किया है । जिसमें पशुधन का संरक्षण एवं विकास एक महत्पूर्ण अंग है परन्तु हिमाचल प्रदेश में इस क्षेत्र में विकास की हालत यह है कि वर्ष 2007 में लगभग 52 लाख पशुधन की तुलना में वर्ष 2017 में यह संख्या घट कर 44 लाख 58 हजार पर सिमट गई है मात्र दस वर्षों में पशुधन में लगभग 8 लाख की कमी चिंतनीय है। वर्ष 1980-81में इस क्षेत्र ( दूध, घी, उन, मांस, खाद व अन्य कार्यों में उपयोग ) का प्रदेश की जीडीपी में योगदान 11.84% था जो अब 4.95 % रह गया है। इसमें सबसे अधिक चिंता का विषय है कि गौजातीय पशुओं के साथ साथ भेड़ और बकरियों की संख्या में भी कमी अाई है। प्रदेश में सह आस्तित्व व समान अधिकारों का गला किस कदर घोंटा गया है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बिलासपुर में कोठीपुरा का फार्महाउस, मण्डी में नेरचौक सीमेन बैंक , कमांद स्थित गौ प्रजनन केंद्र व घोड़ा संवर्धन केंद्र कथित मानव विकास की बलि चढ़ चुके हैं। इस बहुमूल्य जमीन के बदले में आजतक पशुपालन विभाग को कुछ भी नहीं मिला है।
पिछले एक दशक में प्रदेश के पशुधन में रहे इस हास के पीछे अनेकों कारण है जिनमे मुख्यतः संयुक्त परिवार प्रणाली का धीरे धीरे कम होना, बड़े भूमि जोतो का बंटवारा, चरागाहों का सिकुड़ना, पशु चारे में कमी, डेयरी प्रोडक्ट्स के लिए बाजार न होना,अच्छे किस्म के पशुओं की अनुपलब्धता और मंहगे पशु, पशुओं के लिए पर्याप्त चिकित्सा सेवाओं का अभाव होना है। राष्ट्रीय पशुधन नीति 2013 के अनुसार 5,000 पशुओं पर एक चिकित्सक होना अनिवार्य है जबकि हिमाचल में 17,000 पशुओं पर एक चिकित्सक उपलब्ध है। प्रदेश पशुपालन विभाग में एक प्रदेश स्तरीय अस्पताल से लेकर पशु औषधालय तक 2125 इकाइयां कार्य कर रही है जिसमें केवल 409 चिकित्सा अधिकारी कार्यरत है और 111 पद अभी रिक्त चल रहे हैं। प्रदेश में पशुओं का इलाज की कमान लगभग 2100 वेटरनरी फार्मासिस्टों के हाथों में हैं। और बहुत उदाहरण ऐसे हैं कि इनमें से कुछ एक की अनुभवहीनता की कीमत पशुपालक को गऊ की बांझता के रूप में चुकानी पड़ती है। अंततः पशुपालक के पास उस बांझ गऊ को सड़कों में छोड़ने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचता है। गौरतलब है कि प्रदेश भर में 35,000 से अधिक पशु सड़कों में बेसहारा फिर रहे हैं।
प्रदेश सरकार प्रयास करे तो प्रदेश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने के साथ गांव, गरीब को समृद्ध बनाया जा सकता है। इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की अपार संभावनाएं है इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है भारत में एक गाय सालाना औसतन 1118 लीटर दूध देती है वहीं अमेरिका में एक गाय औसतन 6,000 लीटर दूध देती है प्रदेश में इस समय 1460 हजार टन दूध का उत्पादन हो रहा है और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हम पड़ोसी राज्यों पर निर्भर हैं। जबकि थोड़ी से प्रयत्नों से हम इस क्षेत्र में न केवल आत्मनिर्भर बल्कि अन्य राज्यों की जरूरतें भी पूरी कर सकते हैं। यह इसलिए संभव है क्योंकि प्रदेश के 70% कृषक किसी न किसी रूप में पशुपालन व्यवसाय से जुड़े हैं। इसी तरह प्रदेश में भेड़ और बकरियां तादाद में तो ज्यादा है परन्तु ऊन व मांस की उत्पादन क्षमता में वह उन्नत किस्म नस्लों से बहुत पीछे है। पशुधन के महत्व को देखते हुए राज्य सरकार को चार स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है पहला उन्नत किस्म के पशुधन की उपलब्धता, दूसरा चारे व बीमा की पर्याप्त व्यवस्था, तीसरा बाजार की सुलभता और सबसे महत्त्वपूर्ण घर द्वार पर चिकित्सा व्यवस्था। इसके लिए महत्वपूर्ण है कि पशुपालन विभाग में पशुपालन सेवाओं और पशु चिकित्सा सेवाओं को अलग अलग कर दिया जाए। उपरोक्त वर्णित पहले तीन कार्यों को पशुपालन सेवाओं के अधीन किए जाए और पशु चिकित्सा सेवाओं को अलग से रखा जाए।
इसके अतिरिक्त पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान कॉलेज, पालमपुर को स्तरोन्नत करके विश्वविद्यालय बनाया जाना, चिकित्सा सुविधा बढ़ाना, मोबाइल पशु अस्पतालों की स्थापना , कोल्ड स्टोर के चेन की स्थापना , फॉडर बैंक व कैटल फीड यूनिट्स की स्थापना के लिए बेरोजगारों को प्रोत्साहित करना, जन औषधि केंद्र की तर्ज पर पशुओं के लिए सस्ती दवाइयों के केंद्र खोलना , सस्ती दर पर बीमा और प्रत्येक पशु का रजिस्ट्रीकरण जैसे अनेकों कदम है। और सबसे महत्त्वपूर्ण है इस क्षेत्र में को-ऑपरेटिव आंदोलन खड़ा करना जो आत्मनिर्भर हिमाचल की आधारशिला साबित होगा।

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