हजारों श्रद्धालु बाराती बनकर नाचे शिव-पार्वती विवाह में
रेणुका गौतम, कुल्लू : हिन्दू धर्म में महादेव और पार्वती मां की जोड़ी को विशेष स्थान एवं सम्मान दिया जाता है। जहां महाशिवरात्रि का उत्सव शिव और शक्ति के मिलन यानी पवित्र विवाह का प्रतीक है वहीं ज़िला कुल्लू में हर वर्ष शिव-पार्वती विवाह का लेकर रलियां उत्सव धूमधाम के साथ आयोजित होता है।

विवाह का सजा मंडल, ‘धाम’ यानी कतारों में बैठ कर भोजन करते लोग और धूमधाम से बारात में नाचते बाराती। यह कोई साधारण विवाह नहीं बल्कि भगवान शिव और मां पार्वती के पावन विवाह का दृश्य है।

श्रद्धालुओं में इस उत्सव के दौरान अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। अरुणा सूद और रिचा सूद कहना है कि हर वर्ष ही चैत्र मास की सक्रांति से शुरू होकर वैशाख मास की सक्रांति तक इस उत्सव की धूम रहती है। पहले महीना भर शिव पार्वती के सम्मान में भजन कीर्तन किया जाता है और अंत के तीन दिनों में हल्दी, मेहंदी महाभोज और बारात भी निकाली जाती है।


जिसमें बकायदा भगवान शिव और मां पार्वती की पायां सजाकर असली विवाह की भांति ही ढोल नगाड़े और नृत्य किया जाता है। अंत में दोनों की प्रतिमाओं को सम्मान पूर्वक व्यास नाडी में विसर्जन के साथ यह उत्सव संपन्न होता है।

साथ ही मोहलता शर्मा सहित अन्य श्रद्धालु इस इस उत्सव को आपसी ताल में सद्भावना का प्रतीक मानते हैं। उनका कहना है कि इस तरह के आयोजन और धार्मिक उत्सव ही है जो हमें भगवान आस्था और श्रद्धा जैसे विषयों से जोड़कर रखते हैं। इसी बहाने आजकल की दौड़भाग भरी जिंदगी में आम जनमानस एक दूसरे से मिलजुल कर एकता में रहना सीखता है।

वहीं कुल्लू के राजघराने से ताल्लुक रखने वाली शिवानी सिंह ने सभी जिला वासियों को इस पावन अवसर पर बधाई दी और इस तरह की धार्मिक परम्पराओं की सराहना की तो साथ ही महिलाओं के वर्तमान समय में सुरक्षित रहने की भी कामना की।


दिन भर विवाह की रस्में निभाते हुए धूमधाम के साथ भगवान शिव और मां पार्वती की मूर्तियों को दूल्हा और दुल्हन की भांति सजाकर पालकी में बिठाकर बारात निकाली गई। और बड़ी संख्या में श्रद्धालु बारातियों की भांति ढोल नगाड़ों की धुनों पर झूमते हुए रामशिला के हनुमान मंदिर पहुंचे और परंपरानुसार हर वर्ष की भांति ब्यास नदी में मूर्तियों को विसर्जित कर उत्सव संपन्न हुआ।

