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प्रकृति से बड़ा जादूगर नही कोई ..क्यों हो गए नदी नाले साफ …क्या आपने सोचा

प्रेम सिंह ठाकुर

“गंगा तेरा पानी निर्मल झर- झर बहता जाए” इस गाने के बोल जब कानों में पड़ते थे तो मानो ऐसा लगता था कि ये शब्द सिर्फ कवि की कपोत कल्पना ही है। वर्तमान समय यह कदापि संभव नहीं है। देश व्यापी लोकडाउन से पूर्व हालात ये थे कि गंगा, यमुना के प्रति अगाध श्रद्धा ना होती तो जल का आचमन तो दूर छींटे भी पड़ जाएं तो ही इंसान अपवित्र हो जाए। इन पवित्र नदियों के प्रति आम भारतीय की इतनी श्रद्धा है कि गंदले नालों में परिवर्तित हो चुकी इन धाराओं में आज भी स्नान करके स्वयं द्वारा किए गए पापों से स्वयं को मुक्त समझता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी ये है कि इसमें सरकार पहले स्वयं ही समस्या खड़ी करती है और बाद में उसी समस्या के समाधान के लिए सभी प्रकार के संसाधनों को झोंकती है। उसी से तो नेताओं, नौकरशाहों और न्यायवादियों की रोज़ी रोटी चलती है। गंगा यमुना के मामले में भी ठीक हुआ। सरकार की लापरवाही ने गंगा यमुना के किनारे हजारों लाखों प्रदूषण फैलानी वाली इकाईयों को लगाने की मंजूरी दी। ऋषिकेष से लेकर कोलकात्ता तक रासायनिक कारखाने , चमड़ा उद्योग व परमाणु संयत्र सब इस महान पवित्र नदी के किनारे स्थापित किए गए हैं। विभिन्न सरकारों कि लापरवाही का नतीजा है हजारों की संख्या में छोटे बड़े कस्बों से लेकर बड़े शहरों की गन्दगी को इन पवित्र नदियों में समाने दिया जाता है , न्यायिक सक्रियता कहें या फिर जनता का दवाब बाद में करोड़ों अरबों रुपए फूंक कर गंगा – यमुना की सफाई की योजनाएं चलाई जाने लगी । हालत ये है कि इतना धन फूंकने के बाद भी इन नदियों में नहाना तो दूर इनके किनारे खड़े होकर सांस लेना भी दूर्भर हो गया हुआ था।
एक अनुमान के अनुसार अनुसार “गंगा एक्शन प्लान “के नाम पर बीस वर्षों में लगभग 1200 करोड़ रुपए खर्च किए गए । गंगा तो साफ नहीं हुई पर नेता और नौकरशाह अमीर अवश्य हो गए। इसी तरह 1993 में शुरू की गई यमुना कार्य योजना पर अब तक 1514करोड़ खर्च किए जा चुके हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी प्राण वायु समझने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए तो गंगा यमुना की स्वच्छता इतना बड़ा मुद्दा था की उन्होंने वर्ष 2014 में भाजपा की केंद्र में सरकार बनने पर इसके लिए अलग ही मंत्रालय बना दिया। और 2037 करोड़ रुपए की नमामि गंगे योजना की तहत गंगा और यमुना की सफाई की जिम्मेदारी साध्वी उमा भारती को ही सौंप दी। जल्दी ही 28,000 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान करके 305 के लगभग विभिन्न प्रोजेक्ट शुरू किए जिनका सीधा संबंध गंगा और यमुना जी की सफाई से था । केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी जी ने यहां तक घोषणा कर दी थी कि 2019तक गंगा जी 80 प्रतिशत तक पवित्र हो जाएगी। कशिशें तो जबरदस्त हुई पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। कुछ स्थानों में गंगा के पानी में पूर्व की तुलना में परिवर्तन देखने के लिए तो अवश्य मिला पर यह नाम मात्र के लिए ही था। उस कदर साफ नहीं थी जिस कदर दावे किए गए थे। पिछली छ्ठ पूजा के दौरान दिल्ली में यमुना जी की जो तस्वीरें अाई थी वह भयावह थी। रासायनिक गन्दगी से बना हुआ झाग में घुटनों तक खड़ी हुई महिलाएं जब सूर्य पूजा कर रही थी तो स्वयं की लाचारगी पर शर्म आ रही थी।
जिस तरह से आबादी बढ़ रही है है और बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए कल कारखाने खुल रहे हैं शहरों का आकार बढ़ता जा रहा है और इन कारखानों और शहरों की गन्दगी यमुना और गंगा जी में निरंतर मिल रही है उस से से तो यह लगता है कि अगर सरकार ‘नमामि गंगे ‘ बजट को बढ़ा कर दो लाख करोड़ भी कर दें तो भी यमुना और गंगा साफ नहीं होने वाली हैं। सरकार की भी मुश्किल है कि बढ़ती आबादी की जरूरतें पूरी करें या नदी की सफाई के लिए अधिकांश बजट को खर्च कर दे।
पर कहते हैं प्रकृति से बड़ा जादूगर कोई नहीं है। कोरोना यानी कोवीड- 19, महामारी के कारण जो समस्त दुनियां में संकट आया वहीं ये कहर बरपाता वायरस कुछ सुखद एहसास भी लेकर आया है। केंद्रीय पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के वास्तविक समय के निगरानी आंकड़ों के अनुसार गंगा नदी के विभिन्न बिंदुओं पर स्थित 36 निगरानी इकाइयों में करीब 27 बिंदुओं पर पानी की गुणवत्ता नहाने और वन्यजीव तथा मत्स्य पालन के अनुकूल पाई गई है। जो पहले मात्र तीन या चार बिदुओं के अनुकूल थी। इसी तरह यमुना का पानी काफी हद तक साफ हो गया है । पहले यमुना के पानी को गंदे नाले की पानी की तरह देखने वाले इतनी स्वच्छ यमुना देखकर हैरान है। लाखों करोड़ों रुपए खर्च करके भी विभिन्न सरकारें न कर पाई वो एक को रो ना वायरस ने एक महीने के अंतराल में करके दिखा दिया। गंगा और यमुना में साफ पानी, दिल्ली में तारों भरा आसमान और जालंधर से हिमाचल के पहाड़ियां का दिखाई देना वास्तव में किसी अच्ंभे से कम नहीं। दो दशकों के भीतर पैदा हुई एक पीढ़ी के लिए तो यह परिवर्तन सातवें अजूबे की तरह है। नहीं तो प्रदूषण रहित भारत किसी कवि की कल्पना और किताबों में लिखे हुए किस्से ,कहानियों तक ही सिमट कर रह गया था। को रो ना ने भले ही मानव जाति के समक्ष एक संकट खड़ा किया है पर मानव पहले से ही स्पेन फ्लू ,प्लेग , स्वाईन फ्लू जैसे अनगिनत संकटों से भली भांति निपटता आया है और जल्दी ही इस खतरे पर भी काबू पा लेगा,पर खतरे के बीच छुपी प्रदूषण मुक्त संसार की आशा रूपी किरण जो इस कोरोना वायरस ने दिखाई है अगर आज हम उसको हमेशा बनाए रखने के प्रति गंभीर हो गए तो हम आपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतरीन धरा छोड़ जायेंगे।

प्रेम सिंह ठाकुर
अधिवक्ता , सुन्दर नगर , मण्डी
सामाजिक चिंतक

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