Friday, February 26, 2021
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जनरल जोरावर सिंह : भारत का वीर सपूत जिसकी वीरता के दुश्मन भी हुए कायल


जम्मू-कश्मीर को भारत माता का मुकुट कहा जाता है। भारत का यह वह क्षेत्र है जहां पर वैदिक साहित्य की रचना हुई। ऐसे धरती पर स्वर्ग की संज्ञा दी जाती है। यह पावन धरती अनेक ऋषि मुनियों की तपोस्थली होने के साथ रणबांकुरों की पावन धरती भी रही है। सर्वोच्च उत्सर्ग और बलिदान की मिसाल कायम करने वालों में जनरल जोरावर सिंह शिरोमणि हैं। जम्मू के महाराजा गुलाब सिंह की सेना में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हुई। अपनी योग्यता से सेनानायक वजीर के पद पर स्थापित हुए। जोरावर सिंह ने सीमांत क्षेत्रों की रक्षा की व सुदूर हिमालय पर्वत तक राज्य की सीमाओं का विस्तार की करके विजय परचम फहराया जनरल जोरावर सिंह भारत के स्वर्णिम इतिहास की परंपरा में एक प्रमुख योद्धा राष्ट्र नायक की भूमिका में प्रतिष्ठित है। जनरल जोरावर सिंह के अदम्य साहस, वीरता एवं पराक्रम से ही लद्दाख आज भी भारतीय गणतन्त्र का अंग है। जनरल जोरावर सिंह एक बहुत बडे़ सैन्य रणनीतिकार और बहादुर सेनानायक थे। यहां तक कि उनके विरोधियों द्वारा भी उनकी वीरता का सम्मान किया गया। जनरल जोरावर सिंह की प्रचण्ड वीरता और अदम्य साहस के कारण ही उनको दूसरा नेपोलियन कहा जाता है। उनमें कुशल प्रशासन के सभी गुण विद्यमान थे। कश्मीर रियासत के राजा गुलाब सिंह की सेना का सच्चा नायक जनरल जोरावर सिंह को ही माना जाता है। जोरावर सिंह का जन्म कब और किस स्थान पर हुआ इस विषय पर लेखकों के मत में भिन्नता है। इतिहासकार जे.सी. स्मिथ लिखते हैं कि वह रियासी के नजदीक कुशाल के निवासी थे। के.एम. पणिकर भी उनको कुशाल के निवासी मानते हैं। हचिसन और बोगल ने लिखा है कि जोरावर सिंह कहलूरिया कहलूर बिलासपुर के राजा का एक बेटा है। प्रो. सुखदेव सिंह चाड़क ने लिखा है कि उसका जन्म 1784 ई. के इर्द-गिर्द कांगड़ा जिला की तहसील हमीरपुर के गांव अन्सरा में चन्द्रवंशी कहलूरिया खानदान में हुआ। सी.एल. दता ने लिखा है कि डोगरा जनरल जोरावर सिंह का जन्म 1786 ई. को अन्सरा गांव वर्तमान जिला हमीरपुर हिमाचल प्रदेश में हुआ। अतः वर्तमान में डॉ. राकेश कुमार शर्मा, सहायक आचार्य, राजकीय महाविद्यालय हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश एवं संपादक “इतिहास दिवाकर” के शोध अनुसार जनरल जोरावर सिंह का सी.एल.दता के शोध के अनुरूप जिला हमीरपुर से संबधित होना प्रामाणिक होता है। इस संदर्भ में अन्सरा पटवार वृत तह. नादौन जिला हमीरपुर से प्राप्त 1910-11 का भू-राजस्व रिकॉर्ड दर्शाता है कि अन्सरा गांव के मूल निवासी थे। सम्बन्धित दस्तावेज में तेजा सिंह व चतर सिंह पुत्र इन्दर सिंह पुत्र जोरावर सिंह दर्शाया गया है। इस रिकॉर्ड के अनुसार यह परिवार 180 कनाल भूमि का स्वामी है। 70 के दशक तक यह परिवार भूमि का स्वामी रहा है। 1971 में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्यत्व मिलने के बाद मुजारा एक्ट लागू हुआ इसके बाद यह भूमि काश्तकारों के अधीन आ गयी जो बंदोबस्त रिकाॅर्ड में झलकता है। जोरावर सिंह व उसके उतराधिकारियों के सम्बन्ध में भू-राजस्व रिकाॅर्ड रिसासी से जो कुर्सीनामा प्राप्त हुआ है वह जिला हमीरपुर के अन्सरा पटवार वृत से प्राप्त भू-राजस्व रिकाॅर्ड के कुर्सीनामा से मेल खाता है। नरसिंह दास द्वारा अपनी पुस्तक में उस भू-राजस्व रिकाॅर्ड वंशावली दर्शायी है। अतः इस आधार पर कहा जा सकता है कि जोरावर सिंह का पैतृक गांव अन्सरा तह. नादौन जिला हमीरपुर था। जोरावर सिंह का जन्म हिमाचल प्रदेष के जिला हमीरपुर, तहसील नादौन के अन्तरा गांव में 13 अप्रैल 1786 में हुआ था। 16 वर्ष की आयु में वे घर से रोजगार की तलाश में निकल पड़े। वहां पर 1803-04 ई. में वह महाराजा रणजीत सिंह की सेना में भर्ती हो गये। यहां पर किसी बात को लेकर सैनिक टुकड़ी के नायक से झगड़ा हो गया व उसकी हत्या कर दी। इसके बाद वह रणजीत सिंह की सेना को छोड़कर कांगड़ा के शासक महाराज संसार चंद की सेना में भर्ती हो गये। गोरखों के खिलाफ महाराजा संसार चंद की सहायता के लिए जब संसार चंद की सहायता के लिए जब लाहौर का शासक महाराज रणजीत सिंह व उसकी सेना कांगड़ा पहुंची तो सिक्ख सैनिकों ने उसको पहचान लिया। अतः वह जम्मू की ओर आये। जम्मू में धौंधलीं ढक्की में उनकी महाराजा गुलाब सिंह से उनकी मुलाकात हुई। जोरावर सिंह में वीरता के गुण बचपन से कूट-कूट कर भरे थे। वे राजा गुलाब सिंह की सेना में सामान्य सिपाही के तौर पर नियुक्त हुए थे। इनकी योग्यता और बहादुरी के दम पर इन्हें राशन वितरण अधीक्षक बनाया गया। उनको अब कर निर्धारण करने, स्वतंत्रतापूर्वक सेना का गठन करने व इर्द-गिर्द की रियासतों को विजय करने की स्वतंत्रता दे दी गयी। इसके बाद जोरावर सिंह रियासी किलेदार बने। महाराज गुलाब सिंह उनके व्यक्तित्व और गुणों से बहुत प्रभावित हुए और 1821 में उन्हें किश्तवाड़ का गवर्नर बनाया गया। तत्पश्चात 1820 ई. में जोरावर सिंह को बजीर की उपाधि दी गयी और वे सेना के प्रशिक्षण कार्य में लग गये।
ब्यास नदी में लगाई छलांग
जिस समय जोरावर का जन्म हुआ, तो पंडित गंगाराम ने इस बालक की जन्म कुंडली बनाकर जांची, तो उसने ये भविष्यवाणी की थी कि यह बालक बड़ा होकर अपनी जन्म भूमि से दूर जाकर अपनी बहादुरी से अमरयश मान प्राप्त करेगा। जिस समय सिक्ख सैनिक जोरावर सिंह को बेडियों में जकड़ कर लाहौर की ओर जा रहे थे, तो देहरा गोपीपुर में उनका रात पड़ गई। सैनिकों ने वहीं पर ब्यास नदी के पत्तन पर रात काटने की योजना बनाई। रात्रि को जोरावर सिंह ने लघुशंका का बहाना बनाकर ब्यास नदी की तेज धारा में छलांग लगा दी और तैरता हुआ बहुत दूर निकल कर हरिपुर गुलेर के निकट किनारे लगा। वहां एक घराट में जा कर घराटी से अपनी सारी व्यथा-कथ सुना डाली। घराटी को इस पहाड़ी युवक पर दया आ गई, उसने रात को ही गांव के लोहार को बुलाया और जोरावर की लोहे की बेड़ियां कटवाकर उसे बंधन मुक्त कर दिया।

लद्दाख के युद्ध को कौन भुला सकता है, जिसमें जोरावर सिंह की कुशल युद्धनीति का परिचय पूरे विश्व को मिला। जनरल जोरावर सिंह ने 1834 ई. को किश्तवाड़ के रास्ते से सुरू नदी घाटी को पार कर लद्दाख क्षेत्र में प्रवेश किया। 1834 में यह लड़ाई 11 हजार फीट की उंचाई पर लड़ी गयी थी, जिसमें कड़े संघर्ष के बाद जनरल जोरावर सिंह की सेना ने दुष्मनों के दांत खट्टे कर दिये। 1840 ई. तक लद्दाख व बाल्टिस्तान को अपने अधीन कर लिया। तिब्बत और बाल्टिस्तान को जम्मू राज्य का अंग बना दिया गया। जोरावर सिंह पहले ही पश्चिमी तिब्बत को अपने अधीन करना चाहते थे, परन्तु महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें ऐसा करने से इंकार कर दिया। महाराजा गुलाब सिंह लाहौर के सिक्ख शासक महाराजा रणजीत सिंह के अधीन थे। अतः किसी भी क्षेत्र की ओर अभियान से पूर्व वे उनकी अनुमति लेते थे और जीते हुए क्षेत्रों की जानकारी महाराजा रणजीत सिंह को दिया करते थे।
किश्तवाढ़ में फहराई विजय पताका
महाराजा गुलाब सिंह का विश्वास पात्र मंत्री तथा सेनानायक बनाने के बाद जोरावर सिंह ने अपने ‘अन्नदाता स्वामी’ के सपनों को साकार करने का संकल्प लिया। इस डोगरा जरनैल ने सर्वप्रथम अपने चुने हुए सैनिकों को कश्मीर के साथ लगने वाले राज्यों लद्दाख तथा बाल्टिस्तान के विजय अभियान के लिए अत्यंत कठिन प्रशिक्षण दिया। ट्रेनिंग पूरी होने पर चुने हुए बहादुर सैनिकों की एक विशाल फौज को शस्त्र-अस्त्रों से सुसज्जित करके अपने महाराजा गुलाब सिंह से विदाई लेकर लेह-लद्दाख के लिए प्रस्थान किया।

1839 ई. में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के उपरान्त सिक्ख जम्मू की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहे थे। दूसरी ओर अंग्रेज, सिक्खों की शक्ति को कमजोर करना चाहते थे इसलिए उन्होंने गुप्त रूप से डोगरों को सैन्य अभियान के लिए स्वीकृति दे दी। उसी का लाभ उठाते हुए डोगरा सेना ने लद्दाख व बाल्टिस्तान को अपने अधीन कर लिया था। अतः जनरल जोरावर सिंह ने पुनः लद्दाख पहुंचने पर तिब्बत की ओर कूच करने की योजना बनाई। जून, 1841 ई. में जोरावर सिंह ने पश्चिम तिब्बत की सीमान्त चैकियों पर आक्रमण किया। जोरावर सिंह की सेना में छः हजार डोगरे तथा 3000 लद्दाखी व बाल्टिक सैनिक थे। बाल्टिस्तान में राजा अहमदशाह व उसके बेटे मुहम्मद शाह के बीच मतभेद चल रहा था। मुहम्मद शाह जोरावर सिंह की शरण में आ गया। अहमदशाह ने मुहम्मद शाह को बलपूर्वक अगवा कर लिया। जोरावर सिंह ने उसको छोड़ने की मांग की परन्तु अहमदशाह ने इंकार कर दिया। अब जोरावर सिंह ने बल्टिस्तान की ओर रूख कर दिया। नवम्बर 1839 में डोगरा सेनापति बंका काहलों, अन्य लद्दाखी अधिकारियों व लद्दाख के बूढ़े राजा व डोगरा सेना को बाल्टिस्तान की ओर चलने को कहा। जोरावर सिंह की सेना ने मरोल व खरमंग के रास्ते से बाल्टिस्तान में प्रवेश किया। अहमदशाह ने 20 हजार सैनिक सेनापति गुलाम हुसैन के नेतृत्व में मरोल के स्थान पर जोरावर सिंह की सेना का रास्ता रोकने के लिए भेजे। चेचे थंग के स्थान पर बल्ति सेना पुल को तोड़ दिया। जोरावर सिंह की सेना को भारी कष्ट उठाने पड़े। कई दिनों बाद महता बस्ती राम ने सिन्धु नदी पर वाको दर्रे के पास बर्फ का पुल बनाया। महता बस्ती राम सहित 40 आदमियों ने पुल को पार किया व बल्टि सेना को पीछे हटने को मजबूर किया। अब डोगरा सेना ने नदी को पार कर लिया। 13 फरवरी 1840 ई. को थामो खोन नामक स्थान निर्णायक यु़द्ध में बल्टि सेनापति बजीर गुलाम हुसैन मारा गया व सेना बुरी तरह से पराजित हुई। अब जोरावर सिंह स्कर्दु की ओर बढ़ा। कुर्रस के राजा ने अधीनता स्वीकार कर ली व स्कर्दु के किले को अपने अधीन कर लिया। थोमो खोन व स्कर्दु की विजय से सारा बल्टिस्तान जोरावर सिंह के अधीन हो गया। स्कर्दु के राजा अहमदशाह को गद्दी से उतार कर उसके बेटे मुहम्मद शाह को राजा बनाया। उसने 7000 रू वार्षिक कर देना स्वीकार किया। जोरावर सिंह अब वापिस लद्दाख की ओर बढ़ा। रास्ते में डोगरा सेना में चेचक फैल गया जिसके कारण बहुत सारे सैनिक मारे गये व बूढ़ा ग्यालपो भी स्वर्ग सिधार गया। जब जोरावर सिंह ने ग्यालपो के पोते जिगस्मद को लद्दाख का शासक नियुक्त किया। जोरावर सिंह ने अदम्य साहस वीरता व पराक्रम से पश्चिमी तिब्बत को विजित करके जम्मू राज्य की सीमाएं नेपाल की सीमा के साथ मिला दी थी। कैलाश पर्वत व मानसरोवर झील उनके अधीन हो गए थे। आज भारत की सीमाएं सुदूर हिमालय पर्वत तक फैली हुई है तो इसका श्रेय जनरल जोरावर सिंह को ही जाता है। यदि उन्होंने लद्दाख व बाल्टिस्तान को जीतकर जम्मू राज्य का अंग न बनाया होता तो यह भू-क्षेत्र अब भारत का अभिन्न अंग न होता। जनरल जोरावर सिंह ने लद्दाख के युद्ध को करते समय भेड़ की खाल को पहना हुआ था। तिब्बत के तोया युद्ध में इनके अदम्य साहस को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। 12 दिसम्बर 1841 को इस युद्ध में इन्होंने अभूतपूर्व साहस का परिचय दिया और वीर गति को प्राप्त हुए। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि युद्ध ही वीरता की सच्ची परीक्षा है।

जम्मू-कश्मीर राज्य का विस्तार किया

आयुषजीवी जोरावर सिंह को सदा महान सेनानायक, दूरदर्शी सैनिक एवं शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है। इस हिमाचली वीर ने अपने सैन्य जीवन में जो भी महान सफलताएं अर्जित की, उन्हे देखते हुए इस वीर की तुलना चंद्रगुप्त विक्रमादित्य से करना अतिश्योक्ति नहीं होगी, जिसने मध्य एशिया मे हिन्दुकुश पर्वत श्रृंखला पार कर बलख के कबाइलियों को पराजित किया था। इसी प्रकार जोरावर सिंह ने युवा अवस्था में जम्मू नरेश राजा गुलाब सिंह के आदेशानुसार एक बार नहीं अपित 6 बार लेह-लद्दाख, बाल्टिस्थान, स्कर्दू, डाग, छपरंग, सिंधु, करदंग, रूडोक, गोटा तथा तिब्बत तक के विकट बर्फीले दुर्गम क्षेत्र में जाकर विजय पताकाएं फहराकर जम्मू-कश्मीर राज्य का विस्तार किया तथा अपने स्वामी गुलाब सिंह को महाराजा की उपाधि दिलाई। इस वीर की बदौलत भारत को 1.30 लाख वर्ग किलोमीटर भू-भाग प्राप्त हुआ।

जनरल जोरावर सिंह भारत के एक ऐसे सपूत हैं जिन्होंने सैन्य इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित किया। विश्व में कोई ऐसा अप्रतिम उदाहरण नहीं मिलता है, जिसमें किसी पराजित सेनानायक की समाधि शत्रु पक्ष ने बनाई हो। लेकिन जोरावर सिंह के अद्भुत पराक्रम से प्रभावित होकर तिब्बतियों ने तोयो नामक स्थान पर उनकी छोरतन समाधि बनायी। इस समाधि का जिक्र कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने वाले अक्सर अपने संस्मरणों में करते हैं। ऐसे ही एक संस्मरण में स्वामी प्रणवानंद ने लिखा है कि तकलाकोट के नजदीक तोयो में एक लाल रंग की मिट्टी की समाधि बनी है जोकि परमवीर जोरावर सिंह की समाधि है। यह समाधि उनके परम यशोगान को आज भी तरोताजा कर देती है। प्रणवानंद ने लिखा है कि तिब्बती लोग जनरल जोरावर सिंह को सिंगी गैलवो, शेरों का राजा, सिंगी राजा और सिंगवा ऐसे नामों से पुकारते हैं। लेखक तरुण विजय कैलाश मानसरोवर की यात्रा संस्मरण में लिखते हैं कि जोरावर सिंह के बल पराक्रम से चकित होकर तिब्बतियों ने उनका सम्मान दिखाते हुए जोरावर सिंह की समाधि बनाई है। यह समाधि तकलाकोट से 5 किलोमीटर दूर तोयो नामक स्थान पर है। यदि कोई वहां भ्रमण करे तो वहां के स्थानीय लोग भी बताते हैं कि यह जनरल जोरावर सिंह की समाधि है। आज वह समाधि प्रायः जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

विजयी भूभाग को शांतिपूर्ण प्रांत बना जम्मू कश्मीर से जोड़ा
जनरल जोरावर सिंह के अदम्य साहस पराक्रम व वीरता के परिणाम स्वरुप ही लद्दाख जम्मू कश्मीर राज्य का अंग बना व आज भारतीय गणराज्य का अंग है। लद्दाख और बाल्टिस्तान की बर्फ से ढकी चोटियों में समुद्र तल से 15000 फुट से भी ऊंचाई पर जहां हवा ही इतनी कम है कि मैदानों के रहने वालों को सांस लेने में कठिनाई होने लगती है वहां एक दो बार नहीं बल्कि 6 बार सैन्य अभियान पर जाना एक आश्चर्यजनक उपलब्धि है। एक के बाद एक अनेक अभियानों से किसी देश पर जीत हासिल करना और उसे अपना ही शांतिपूर्ण प्रांत बना लेना ऐसा दुश्कर कार्य है जिसकी कोई और मिसाल भारतीय इतिहास में नहीं मिलती। भारत के इस महान सपूत के योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता।

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