शिमला, विश्व में 8 मई के दिन थेलेसिमिया दिवस के रूप में मनाया जाता है, इस दिन विश्वभर में विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों द्वारा रक्तदान शिविर लगाकर थेलेसिमिया पर सेमिनार व वेबिनार आयोजित किए जाते हैं। थेलेसिमिया बीमारी के रोगी पूरे विश्व में हैं लेकिन भारत में इनकी संख्या बहुत अधिक है। यह एक अनुवांशिक बीमारी है। बुधवार को एपीजी शिमला विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष और ब्लड-कनेक्ट फाउंडेशन की ओर से एक दिवसीय वेबिनार थेलेसिमिया रोग से संबंधित जानकारी, जागरूकता और रक्तदान के महत्व पर वेबिनार आयोजित किया गया जिसमें छात्रों, शिक्षकों और स्थानीय लोगों ने भाग लेकर अपनी दिलचस्पी दिखाई। वेबिनार में ब्लड-कनेक्ट फाउंडेशन की ओर से तजेंद्र ने थेलेसिमिया रोग और इसमें रक्तदान के महत्व पर प्रकाश डाला कि किस तरह थेलेसिमिया पीड़ित बच्चों व रोगियों को जीवनदान दिया जा सकता है। डॉ. तजेंद्र ने बताया कि थेलेसिमिया एक अनुवांशिक बीमारी है, इस बीमारी के लक्षण जन्म के कुछ सप्ताह के बाद ही दिखाई देने शुरू हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी के कारण चेहरे का पीलापन, चेहरे व आँखों में सूजन, भूख कम लगना, अत्यधिक सुस्त रहना व चिड़चिड़ापन आदि देखने को मिलता है। तजेंद्र ने बताया कि हीमोग्लोबिन की मात्रा को पूरा करने के लिए थेलेसिमिया रोगी को चार सप्ताह में एक बार रक्त चढ़वाना पड़ता है लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है तो यह सप्ताह में एक बार तक पहुंच जाता है। तजेंद्र ने बताया कि थेलेसिमिया से पीड़ित बच्चों की अस्थि-मज़्ज़ा में अविकसित लाल रक्त-कोशिकाओं का निर्माण होता है और इनका जीवन-काल भी सामान्य लाल रक्त-कोशिका से बहुत कम होता है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार कोशिकाओं की कमी के कारण हमेशा हीमोग्लोबिन की कमी बनी रहती है और रोगी को उम्रभर रक्त चढ़वाने की आवश्यकता बनी रहती है। तजेंद्र ने छात्रों को बताया कि थेलेसिमिया रोगी मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं जैसे थेलेसिमिया माइनर, थेलेसिमिया मध्यम व थेलेसिमिया मेजर। तजेंद्र ने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के माध्यम से छात्रों को बताया कि थेलेसिमिया माइनर पुरूष व महिला दिखने में बिल्कुल स्वस्थ व इनका हीमोग्लोबिन लेवल भी आमतौर पर सामान्य रहता है। वहीं वेबिनार में हर्ष ने बताया कि व्यक्ति को थेलेसिमिया माइनर होने का पता केवल रक्त की जाँच करवाने पर ही लगता है। तजेंद्र ने बताया कि एक अनुमान के अनुसार पूरे भारत में 6 करोड़ बच्चे व बड़े थेलेसिमिया माइनर हैं लेकिन इनमें मात्र दो से तीन प्रतिशत लोगों को ही अपने माइनर होने की जानकारी होगी जिनमें विशेषकर वे लोग आते हैं जिनके बच्चों में थेलेसिमिया मेजर बीमारी आती है। उन्होंने बताया कि जब ऐसे दो थेलेसिमिया माइनर हैं कि आपस में शादी हो जाती है तो उनके होने वाले बच्चों के मामले में पचास प्रतिशत बच्चे उन जैसे माइनर व पचीस प्रतिशत बच्चे थेलेसिमिया मेजर होने की संभावना बनी रहती हैं। हर्ष ने बताया कि भारत में दस लाख से अधिक थेलेसिमिया रोगी हैं। ब्लड-कनेक्ट फाउंडेशन की अध्यक्षा तजेंद्र ने छात्रों को बताया कि थेलेसिमिया अनुवांशिक बीमारी होने के कारण अभी तक ऐसी किसी भी दवाई की खोज नहीं हुई जिसके प्रयोग से इस बीमारी को ठीक किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि थेलेसिमिया का एकमात्र इलाज बोन-मैरो-ट्रांसप्लांट है लेकिन यह छोटी आयु में कारगर हो सकता है। उन्होंने कहा कि थेलेसिमिया बीमारी को जनजागरूकता, सही समय पर टेस्ट करवाना, थेलेसिमिया के प्रति भ्रांतियों को दूर करना और रक्तदान करके कुछ हद तक खत्म किया जा सकता है और थेलेसिमिया रोगी सामान्य लोगों की तरह जीवन जी सकते हैं।


