Friday, March 1, 2024
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अनोखी डाली का इतिहास जानिए क्या है इतिहास.

दीवाली से पूरा एक महीने बाद मनाया जाने वाला शिमला का प्रसिद्ध ‘अनोखी डाली’ मेला आज पूरे हर्षोल्लास से मनाया है रहा है ।मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर आज इस मेले में शिरकत होगी।

दो दिन तक चलने वाले इस मेले का मुख्य आकर्षण ठोडो का खेल, कबड्डी व अन्य रंगारंग कार्यक्रम होंगे। ‘अनोखी डाली’ मेला राजधानी शिमला से करीब 25 किलोमीटर दूर जुब्बड़हट्टी एयरपोर्ट में कई सालों से मनाया जा रहा है। 115 साल पुराने इस मेले के इतिहास के बारे कहा जाता है कि इस स्थान पर नरसिंह का मंदिर हुआ करता था और मंदिर के पास पीपल के पेड़ में नरसिंह का वास था जिसकी पुजारी पूजा करते थे। एक दिन दोपहर 12 बजे पीपल का पेड़ टूट कर गांव में घरों पर जा गिरा और उसी रात पुजारी को नरसिंह देवता ने स्वपन में कहा कि वह वंहा से विस्थापित होकर जंगल में एक अलग किस्म के पेड़ (डाली) में वास कर चुके हैं। इसलिए उन्होंने पुजारी को जंगल में उस अनोखे पेड़ को ढूंढ कर उसकी पूजा करने को कहा। जिसके बाद गांव के बुजर्गों ने उस अलग किस्म के पौधे को ढूंढा और नरसिंह देवता का उस स्थान पर चौतरा बनाकर पूजा अर्चना करनी शुरू कर दी।

स्थानीय बजुर्ग ने बताया कि नरसिंह भगवान ने पुजारी को सपने में ये भी कहा था कि उनका दीवाली के एक महीने बाद पड़ने वाली प्रतिपदा व दूज के दिन एक मेला मनाया जाए। साथ ही तीर कमान का खेल खेला जाए जिसके बाद से ये परम्परा आज तक गांव के लोग निभा रहे है। क्योंकि जिस पेड़ (डाली) में नरसिंह देवता ने वास किया वह पेड़ जंगल में मौजूद सभी पेड़ों से अलग था। इसलिए इसका नाम अनोखी डाली पड़ा। वर्तमान में जहां शिमला जुब्बड़हट्टी एयरपोर्ट है उस स्थान पर नरसिंह देवता का वास था, जिस स्थान पर सदियों पहले एक अनोखा पौधा उगा, इलाके में जिस किस्म का पौधा कभी किसी ने नहीं देखा था। 1982 में जुब्बड़हट्टी एयरपोर्ट का निर्माण होने के बाद मेले का स्थान बदलना पड़ा। कुछ साल जुब्बड़हट्टी से चार किलोमीटर पीछे शिमला की ओर हल्टी जगह में यह मेला लगा।
इसके आसपास की जगह एयरपोर्ट में तैनात सीआइएसएफ के जवानों के रेजिडेंस होने से यहां भी स्थान बदलना पड़ा और अब जुब्बड़हटृटी मुख्य बाजार में एक निजी स्कूल के ग्राउंड में यह ‘अनोखी डाली’ का मेला लगता है। लोग इस मेले को देव परंपरा से जोड़ते हैं और इस मेले को देखने के लिए दूर-दूर से आते है। थोड़ो खेल जो तीर कमान से खेला जाता है इस मेले का आकर्षण और परंपरा है। खेल के अतिरिक्त ठोडो नृत्य भी होता है जो पुरानी विलुप्त होती परंपरा है। स्थानीयों का कहना है कि कौरव पांडवों से लेकर यह खेल चला आया है और नई पीढ़ी भी इस खेल को कायम रखे ऐसी उम्मीद जताई है। लुप्त होते जा रहे प्रदेश के थोड़ो नृत्य को बचाने के लिए गांव के लोगों का प्रयास सराहनीय है। मेले और पुरानी परंपराएं हिमाचल प्रदेश की अलग पहचान है लेकिन आधुनिकता की दौड़ में लोग अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे है जिसे बचाने की जरुरत है तभी प्रदेश की अद्भुत संस्कृति की पहचान कायम रहेगी।

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